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भीष्म पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
नाराचेन सुतीक्ष्णेन भृशं विद्ध्वा व्यकम्पय़त् |  ४४   क
शिखण्ड्यपि ततो राजन्द्रोणपुत्रमताडय़त् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति