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वन पर्व
अध्याय २०५
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व्याध उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु मृगय़ां निर्गतो नृपः |  २४   क
सहितो योधमुख्यैश्च मन्त्रिभिश्च सुसंवृतः |  २४   ख
ततोऽभ्यहन्मृगांस्तत्र सुवहूनाश्रमं प्रति ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति