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भीष्म पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं शान्तनवो राजन्नभ्यधावद्धनञ्जय़म् |  ८   क
प्रगृह्य कार्मुकं घोरं कालदण्डोपमं रणे ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति