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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
यथाय़ुक्तमनीकं हि धार्तराष्ट्रस्य पाण्डव |  ११   क
नास्य शक्रोऽपि मुच्येत सम्प्राप्तो वाणगोचरम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति