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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
यथैनमनुवर्तन्ते पाञ्चालाः सह पाण्डवैः |  २२   क
त्वरमाणास्त्वराकाले सर्वशस्त्रभृतां वराः |  २२   ख
मज्जन्तमिव पाताले वलिनोऽप्युज्जिहीर्षवः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति