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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
रथानां द्रवतां वृन्दं पश्य पार्थ समन्ततः |  २८   क
द्राव्यमाणं रणे चैव कर्णेनामित्रकर्शिना ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति