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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
पश्य पार्थ धनुः श्रेष्ठं विकर्षन्साधु शोभते |  ३३   क
शत्रूञ्जित्वा यथा शक्रो देवसङ्घैः समावृतः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति