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सभा पर्व
अध्याय २०
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वैशम्पाय़न उवाच
यय़ोस्ते नामनी लोके हंसेति डिभकेति च |  ३१   क
पूर्वं सङ्कथिते पुम्भिर्नृलोके लोकसत्कृते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति