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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
असौ कर्णः सुसंरव्धः पाञ्चालानभिधावति |  ५०   क
केतुमस्य हि पश्यामि धृष्टद्युम्नरथं प्रति |  ५०   ख
समुच्छेत्स्यति पाञ्चालानिति मन्ये परन्तप ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति