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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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कृष्ण उवाच
स वाणसङ्घान्धनुषा व्यवासृज; न्विभाति कर्णः शरजालरश्मिवान् |  ४०   क
सलोहितो रक्तगभस्तिमण्डलो; दिवाकरोऽस्ताभिमुखो यथा तथा ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति