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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
सेना हि धार्तराष्ट्रस्य विमुखा चाभवद्रणात् |  ५४   क
विप्रधावति वेगेन भीमस्य निहता शरैः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति