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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
एते नदन्ति पाञ्चाला धमन्त्यपि च वारिजान् |  ६२   क
अभिद्रवन्ति च रणे निघ्नन्तः साय़कैः परान् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति