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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
पश्य स्वर्गस्य माहात्म्यं पाञ्चाला हि परन्तप |  ६३   क
धार्तराष्ट्रान्विनिघ्नन्ति क्रुद्धाः सिंहा इव द्विपान् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति