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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
सर्वतश्चाभिपन्नैषा धार्तराष्ट्री महाचमूः |  ६४   क
पाञ्चालैर्मानसादेत्य हंसैर्गङ्गेव वेगितैः ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति