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शल्य पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्रोत्सृष्टः स भगवान्गङ्गय़ा गिरिमूर्धनि |  १४   क
स शैलः काञ्चनः सर्वः सम्वभौ कुरुसत्तम ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति