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शल्य पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
स तस्मिन्काञ्चने दिव्ये शरस्तम्वे श्रिय़ा वृतः |  १८   क
स्तूय़मानस्तदा शेते गन्धर्वैर्मुनिभिस्तथा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति