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शल्य पर्व
अध्याय ४३
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जनमेजय़ उवाच
स्कन्दो यथा च दैत्यानामकरोत्कदनं महत् |  ३   क
तथा मे सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति