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शल्य पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
देवर्षय़श्च सिद्धाश्च वृहस्पतिपुरोगमाः |  ३२   क
ऋभवो नाम वरदा देवानामपि देवताः |  ३२   ख
तेऽपि तत्र समाजग्मुर्यामा धामाश्च सर्वशः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति