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शल्य पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
कुरुवंशस्य सदृशमिदं कौतूहलं तव |  ४   क
हर्षमुत्पादय़त्येतद्वचो मे जनमेजय़ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति