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शान्ति पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो विसर्जय़ामास सर्वाः प्रकृतय़ो नृपः |  १   क
विविशुश्चाभ्यनुज्ञाता यथास्वानि गृहाणि च ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति