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शान्ति पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रददौ सहदेवाय़ सततं प्रिय़कारिणे |  १३   क
मुमुदे तच्च लव्ध्वा स कैलासं धनदो यथा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति