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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
प्रादुश्चक्रे ततो द्रौणिरस्त्रं नाराय़णं तदा |  १५   क
अभिसन्धाय़ पाण्डूनां पाञ्चालानां च वाहिनीम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति