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अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
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भीष्म उवाच
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कन्या ऋतुमती सती |  १५   क
चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते स्वय़ं भर्तारमर्जय़ेत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति