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शान्ति पर्व
अध्याय १४७
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जनमेजय़ उवाच
नैव वाचा न मनसा न पुनर्जातु कर्मणा |  २२   क
द्रोग्धास्मि व्राह्मणान्विप्र चरणावेव ते स्पृशे ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति