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शल्य पर्व
अध्याय ६
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सञ्जय़ उवाच
एतच्छ्रुत्वा महाराज वचनं मम साम्प्रतम् |  ३४   क
प्रत्युद्याहि रणे पार्थ मद्रराजं महावलम् |  ३४   ख
जहि चैनं महावाहो वासवो नमुचिं यथा ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति