शल्य पर्व  अध्याय ५७

वासुदेव उवाच

स पपात नरव्याघ्रो वसुधामनुनादय़न् |  ४५   क
भग्नोरुर्भीमसेनेन पुत्रस्तव महीपते ||  ४५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति