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वन पर्व
अध्याय १३३
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द्वारपाल उवाच
वृद्धेभ्य एवेह मतिं स्म वाला; गृह्णन्ति कालेन भवन्ति वृद्धाः |  १०   क
न हि ज्ञानमल्पकालेन शक्यं; कस्माद्वालो वृद्ध इवावभाषसे ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति