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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
अजातशत्रो भद्रं ते शृणु मे भ्रातृभिः सह |  १४   क
त्वत्प्रसादान्महीपाल शोको नास्मान्प्रवाधते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति