आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४४

वैशम्पाय़न उवाच

रमे चाहं त्वय़ा पुत्र पुरेव गजसाह्वय़े |  १५   क
नाथेनानुगतो विद्वन्प्रिय़ेषु परिवर्तिना ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति