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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनप्रभृतय़ो दृष्टा लोकान्तरं गताः |  १९   क
व्यासस्य तपसो वीर्याद्भवतश्च समागमात् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति