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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
तमुवाचाथ गान्धारी मैवं पुत्र शृणुष्व मे |  २५   क
त्वय़्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति