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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽवगाह्य सलिलं सर्वे ते कुरुपुङ्गवाः |  १२   क
युय़ुत्सुमग्रतः कृत्वा ददुस्तोय़ं महात्मने ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति