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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
न चोत्सहे तपोविघ्नं कर्तुं ते धर्मचारिणि |  २९   क
तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति