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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
इतरस्तु जनः सर्वस्ते चैव परमर्षय़ः |  ३   क
प्रतिजग्मुर्यथाकामं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञय़ा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति