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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालाः सुभृशं क्षीणाः कन्यामात्रावशेषिताः |  ३२   क
न तेषां कुलकर्तारं कञ्चित्पश्याम्यहं शुभे ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति