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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
चेदय़श्चैव मत्स्याश्च दृष्टपूर्वास्तथैव नः |  ३४   क
केवलं वृष्णिचक्रं तु वासुदेवपरिग्रहात् |  ३४   ख
यं दृष्ट्वा स्थातुमिच्छामि धर्मार्थं नान्यहेतुकम् ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति