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शल्य पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
एवं नूनं हते वृत्रे शक्रं नन्दन्ति वन्दिनः |  १५   क
तथा त्वां निहतामित्रं वय़ं नन्दाम भारत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति