आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४४

वैशम्पाय़न उवाच

पाण्डवास्तु महात्मानो लघुभूय़िष्ठसैनिकाः |  ४   क
अनुजग्मुर्महात्मानं सदारं तं महीपतिम् ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति