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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्स्नेहपाशवद्धा च हीय़ेय़ं तपसः परात् |  ४१   क
तस्मात्पुत्रक गच्छ त्वं शिष्टमल्पं हि नः प्रभो ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति