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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ते मात्रा समनुज्ञाता राज्ञा च कुरुपुङ्गवाः |  ४३   क
अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठमामन्त्रय़ितुमारभन् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति