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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
राजन्प्रतिगमिष्यामः शिवेन प्रतिनन्दिताः |  ४४   क
अनुज्ञातास्त्वय़ा राजन्गमिष्यामो विकल्मषाः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति