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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनर्निरीक्षन्तः प्रजग्मुस्ते प्रदक्षिणम् |  ४९   क
तथैव द्रौपदी साध्वी सर्वाः कौरवय़ोषितः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति