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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रजज्ञे निनदः सूतानां युज्यतामिति |  ५१   क
उष्ट्राणां क्रोशतां चैव हय़ानां हेषतामपि ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति