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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाद्वले |  ३   क
दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदुः सह कृष्णय़ा |  ३   ख
धनञ्जय़ं शोचमानाः साश्रुकण्ठाः सुदुःखिताः ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति