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सभा पर्व
अध्याय ४४
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शकुनिरु उवाच
लव्धश्च नाभिभूतोऽर्थः पित्र्योंऽशः पृथिवीपते |  ४   क
विवृद्धस्तेजसा तेषां तत्र का परिदेवना ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति