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वन पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभिगम्य कौन्तेय़ः शिरसाभ्यनमद्वली |  १९   क
स चैनमनुवृत्ताभ्यां भुजाभ्यां प्रत्यगृह्णत ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति