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वन पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़न्निव गुडाकेशं प्रेक्षमाणः सहस्रदृक् |  २६   क
हर्षेणोत्फुल्लनय़नो न चातृप्यत वृत्रहा ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति