वन पर्व  अध्याय ४४

वैशम्पाय़न उवाच

घृताची मेनका रम्भा पूर्वचित्तिः स्वय़म्प्रभा |  २९   क
उर्वशी मिश्रकेशी च डुण्डुर्गौरी वरूथिनी ||  २९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति