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वन पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
नन्दनं च वनं दिव्यमप्सरोगणसेवितम् |  ३   क
ददर्श दिव्यकुसुमैराह्वय़द्भिरिव द्रुमैः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति