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वन पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
नातप्ततपसा शक्यो द्रष्टुं नानाहिताग्निना |  ४   क
स लोकः पुण्यकर्तॄणां नापि युद्धपराङ्मुखैः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति